एक दिवाली ऐसी भी…

Kar  dein roshan!
Kar dein roshan!

एक दिवाली ऐसी भी…

मचल रही दिलों में सबके ख़ुशी की एक अजब लहर,
जगमगा उठा हर रास्ता, बूढ़े-बच्चे हुए रोशन चेहरे सभी
इसी सब के दौरान कुछ घरों में मचा है भूख का कहर,
दिवाली हो या ईद, दो-वक़्त की भी रोटी कहाँ नसीब होती कभी!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो दिवाली के दिन नए-नवेले कपडे फबते कुछ बच्चों पर,
रोज़ पांच दिन तक पूजा, छुट्टी और नविन कपडे मनभाते बच्चों को ..
वहीँ बाज़ार में बेचते दिखी एक नन्ही बच्ची फलों से भरी टोकरी रख पर सर,
एक लाचार माँ मांगती दिखी भीक्षा, पास दिखे नग्न अवस्था में बच्चे दो!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

वो हर घर रौशनी- दिये, आकाशदीप और सीरीज की चमकार,
लगे घर में रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्तों की कतार,
पर अभी भी कुछ कुलों में घुप्प अंधकार, कर पाएं आँगन रोशन
एक ही दिये से, उतने तेल की प्रार्थना हर बार!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

घर लाये बच्चे पटाखों की दुकान- अनार, बम, फुलझरियां अपार,
मन-भावन फल-मिठाई-नमकीन का घर बना भण्डारI
दूजी ओर कुछ बच्चे करें इंतज़ार, दिवाली की रात ना फूटे हुए
पटाखों को भोर में चुनकर, शाम में मनाने अपना त्योहार!

एक दिवाली ऐसी भी, एक दिवाली वैसी भी!

इस दिवाली हम सब जगाये अपने संस्कार, किसी गरीब को मिठाई,
किसी को नया वस्त्र बांटके करें अच्छाई का संचार,
कुछ अनाथों, वृद्ध लोगों के लिए बनें रोशनी की किरण,
इस दिवाली, सिर्फ हम ही नहीं, सब मन पाएं ये पावन त्यौहार!

एक नयी दिवाली ऐसी भी!
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8 thoughts on “एक दिवाली ऐसी भी…

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