Tag Archives: #parents

आज जी भर के रोने का मन कर रहा है!

शाम को थककर जब लौटी मैं काम से,
पर्स टटोला, ताकि चाबी से दरवाजा खुल सके
अन्ध्कार में डूबे हुए एक सुनसान कमरे से हुई मुलाक़ात..
उस कमरे को क्या परवाह थी, क्या थे मेरे हालात!

याद आये बचपन के वो सुहाने दिन
परिवार और खुशियाँ, अकेलेपन के बिन,
जब खेल-कूद और बदमाशी कर घर में कदम रखते ही
माँ का सुन्दर चेहरा, और हाथ में ठन्डे पानी का गिलास से थकान मिट सी जाती थी!

बत्तियां जलाकर जब इस बड़े आलिशान घर में थकान मिटानी चाही,
सब सुख, सामर्थ्य, ऐश-ओ-आराम आखिर यहाँ था ही..
न जाने क्यूँ इस तन्हाई में आज दिल कुछ घबरा सा रहा है..
अजीब है ये, पर आज जी भर के रोने का मन कर रहा है!

दिल को संभालकर सोचा रसोई में जाकर कुछ ‘ready-to-eat’ बना के खाया जाये
पर इन नकली, दिखावटी पद्धार्थों से मन कुछ ऊब सा गया है
याद आया वो नाटक करना, दोनों टाइम माँ के हाथ का ‘सादा खाना’ जबरदस्ती खाने पर, हाय!
आज उस ‘सादे’ खाने का एक निवाला खाने को दिल तरस गया है!

बिस्तर पे लेटे हुए ये दिल अपने को और रोक न पाया,
तो याद किया बचपन में कैसे पापा चादर उड़ाते, माँ काम होने पर माथा सहलाके सुलाने करती आया
अब तो रात भर परेशानियों से घिरे, जब नींद चाहती ही नहीं आना
किसी को क्या फरक पड़ता, किसी और का क्या है जाना!

रोज़ एक नयी चुनौती से लड़ना, बहादुरी से हर मुश्किल का सामना करना
आजकल ये जो न कर पाए, प्राइवेट कंपनी में निश्चित है उसका मरना
इन कठिनाईयों से लड़ते लड़ते, इनके सामने डटते डटते मन अन्दर से कहीं टूट सा गया है
क्या शायद इस वजह से इस हारे हुए इंसान को जी भर के रोने का मन कर रहा है?

बस कोई सर पर हाथ फेर दे, माथे पे प्यार से एक चुम्मा रख दे
या पापा की तरह पीठ पर थपकी दे दे, कोई तो अपनेपन का एहसास दे
शायद सच मेंहै जीवन की इस दौड़ में हम बिछड़ जाते हैं अपने अपनों से,
दूर हो जाते दुनियादारी से, पास होते हैं बस अपने सपनों के!

इंसान के ‘पैसों का मोह’ मद्दे-नज़र, किस्मत ने फेका हम सब पे ये मायाजाल है,
आँखें मूँद चले हम इनके पीछे, सब छोड़-छाड़ के, ये सच में युग काल है!
भले ही दुनिया भर की समृद्धि आस-पास हो, मन की शान्ति तो हो जाती कहीं गुम है!
आज जब दिल को ये बात बूझी, तब से ही इसका ऐसा हाल है!

इसीलिए शायद, आज इस हारे हुए मन का जी भर के रोने का मन कर रहा है!

© Aditi Sahu.

Advertisements